Saturday, May 24, 2008

कविता

वाग्जाल नहीं
शब्दों को सही अर्थ देना है कविता

तुम जो आदि हो चुके हो
हर सड़ी-गली
मृतपाय
संस्कारों को
रामनामी पहनाकर
अमर कर देने के
उसे उधेड़ने का नाम है कविता

कितनी अजीब बात है
जो कुछ समय पहले
किसी तरह धकियाकर
अपनी बर्थ पक्की कर चुका है
वह इसे ही शाश्वत सत्य बतलाने लगता है
घोषित करता है उसे
इतिहास के परे की चीज
इतिहास की इन्हीं
परतों को उधेरने का नाम है कविता

संगमरमर की तराश को खुरच
तुम जो शीशे का महल बना रहे हो
और शीशे को अपारदर्शी बना
उसका धर्म बिगड़ रहे हो
उसे एक जोर में चटका देने वाली
पत्थर का नाम है कविता

तुम्हारे विलास का नहीं
गरीबों-मज़लूमों की आह है कविता
हर रुंधे गले में वास करने वाली
तान का नाम है कविता

कविता वह लाल मिर्च है
जो सिर्फ़ खाने का स्वाद नहीं बढाती
आँख में पड़ जाए
तो ऊँगली करवा देती है.

मृत्युंजय प्रभाकर

1 comments:

कुमार मुकुल said...

आपका गुस्‍सा वाजिब है भाई, कविता अंतत: शब्‍दों में आदमी होने की तहजीब है