अप्रैल १, २००८
नई दिल्ली
आज अप्रैल महीने की पहली तारीख़ है. आज की तारीख़ मे ऐसा कुछ खास नही है लेकिन इस तारीख़ ने वास्तव मे मेरे जीवन को एक नया अनुभव दिया और एक नए सिरे से सोचने के लिए मजबूर किया. यूं तो देखने मे ये बात बहुत छोटी लग सकती है की अपने देश को छोड़कर किसी दूसरे देश मे जाना लेकिन वास्तविकता कुछ और है शायद. मैं जानता हूँ की मैं पहला सक्श नही हूँ जो देश छोड़कर जा रहा हूँ मुझसे पहले भी कई गए और मेरे बाद और भी जाएँगे लेकिन मेरे दिमाग मे जो कुछ चल रहा है वो कम से कम मेरे लिए तो एक नया पड़ाव है जिसे मैं नजरंदाज़ नही कर सकता. इस सबके बावजूद भी मैं पूरी कोशिश कर रहा था की मेरे अन्दर जो चल रहा है वो बाहर मेरे चेहरे पर न दिखाई पड़े. अब ये तय करके बताने वाला कोई नही था की मैं अपनी कोशिश मे कितना सफल हुआ. एक ओर जहाँ मैं इस उधेड़बुन मे लगा हुआ था मेरे बाकि सहयात्री जो इस समय मेरे साथ इस प्रतीक्षालय मे बैठे हुए है उन्हें देखकर जरा सा भी ऐसा नही लग रहा की उन्हें कुछ रोमांच महसूस हो रहा है शायद ये उनका पहला अवसर नही था जब वो कहीं बाहर जा रहे हों. तभी एक सज्जन से इस कमरे मे प्रवेश किया है शायद वो हिन्दुस्तानी नही था उसके चाल और व्यव्हार को देखकर किसी अमेरिकन की पहचान मिलती थी उसके चेहरे मे ऐसे भाव थे जैसे किसी भी देश मे टिक कर रहना उसकी आदत नही है और जगह जगह घूमना उसे पसंद है. अचरज मे डालने वाली बात ये थी की उसके हाथ मे राहुल संकृत्यायन की घुमक्कड़ शास्त्र थी जो इस बात का पूरा प्रमाण थी की उसे भी घुमक्कडी करने मे आनंद आता है. कान मे सोनी का एक आई पोड का हेडफ़ोन लगा रखा था और घुमक्कड़ शास्त्र पढ़ने मे मशगूल था. एक पल को उसे देखकर मैं वापस अपने बचकाने ख्यालों मे खो गया. जहाँ तक मेरी बात है तो मुझे अपने ख्यालों मे खोए रहने की आदत है जैसे कोई सोया हुआ आदमी सपने मे खोया हुआ हो. बाकि सब पर नज़र घुमाए तो किसी के चेहरे पर परेशानी का कोई भाव नही दिखाई पड़ रहा था लेकिन मेरे दिमाग मे सिर्फ़ कुछ चेहरे घूम रहे थे. पापा और भइया जो मुझे छोड़ने के लिए अपने अपने काम को छोड़कर यहाँ साथ आये थे उनके चेहरे पढ़ने की कोशिश करता रहा मैं. भइया के चेहरे पर तो कोई खास परेशानी के भाव नही थे लेकिन पापा के साथ शायद ऐसा नही था. बाहर से एक फीकी से मुस्कान उनके चेहरे पर चिपकी हुई थी लेकिन अन्दर से किसी तूफ़ान से झूझने के सारे प्रयास साफ दिखाई दे रहे थे. आखिर उनके मन मे भी ऐसे भाव आना एक स्वाभाविक घटना है. फ़र्ज़ और प्यार की इस लड़ाई मे फ़र्ज़ उनके आगे भरी पड़ता दिख रहा था और उनका वो चेहरा मुझे बहुत पहले से याद है और मुझे जब जब उनका वो चेहरा दिखाई पड़ता है तो एक अजीब से ताकत महसूस करता हूँ मैं अपने अन्दर अपने लक्ष्य को पाने के लिए. बाकि सबके साथ ऐसा नही हुआ होगा. सब बहुत ही शांत दिखाई पड़ रहे थे. अभी एयर इंडिया की फ्लाईट नम्बर आई ३१४ को जाने मे अभी पूरा एक घंटा था और हमे यही पर प्रतीक्षा करने को कहा गया है. सारे यात्री धीरे धीरे आ रहे थे क्यूंकि मैं बहुत जल्दी आ गया था इसलिए इंतज़ार का समय मेरे लिए बहुत ज्यादा था. जापान जाने वाले यात्रियों मे हम सब एक साथ थे जो मोम्बुशो की स्कोलरशिप पर जा रहे थे जिनमे से सब जापान को लेकर अपने अपने विचार और दुविधाएँ पकट कर रहे थे. मुझे ये करना पसंद नही आया क्यूंकि अब तो कुछ घंटो बाद हमे वो सब मिलने ही वाला था जिसे अब तक हम सिर्फ़ किताबों मे ही पढ़ते रहे. यही सब सोचकर मैंने उनकी बातों मे दिलचस्पी न लेकर ऑंखें बंद करके चुप बैठना ही पसंद किया. उन सब मे से एक साथी जिसका नाम शारदा था उसने हमसे बात की कोशिश की. "आप हमेशा ही ऐसे रहते हैं या आज ही घर की ज्यादा याद आ रही है" उसने पूछा."ऐसी बात नही है बस इस बहस मे जाने का मेरा मॅन नही है इसलिए मैं शांत ज्यादा अच्छा हूँ. अभी कुछ घंटों के बाद हम सब वास्तव मे सब महसूस करने वाले हैं. ये सिर्फ़ एक समय जनित संवेदना है जो समय के साथ ही बनती और बिगड़ती है" मैंने जरा विस्तार से बताने की चेष्टा की. "आप को भूख लगी है चलो चलकर कुछ खाते हैं. उसने कहा और मैं भी उसके साथ चाल पड़ा और एक एक समोसा और चाय लेकर हम वापस लौट आए. किसी तरह से उदासी के ये कुछ मिनट गुजरे और स्पीकर पर एक जनानी आवाज़ आई. फ्लाईट नम्बर ऐआई ३१४ उड़ने के लिए तैयार था. हम सब भी चाल पड़े गेट नम्बर ६ की तरफ़ जहाँ से हमे उस फ्लाईट मे बैठना था. जहाज मे घुसाने से पहले तकरीबन ४ एयर होस्टेस के मुंह से वेलकम शब्द सुन चुका था. मैंने भी सबको धन्यवाद दिया और अपने सफर पर चाल पड़ा और जाकर अपनी सीट पर बैठ गया.जहाज के उड़ने से पहले सीट बेल्ट बंधने का आदेश आया और सबने अपनी अपनी सीट से अपने आपको कसकर बाँध लिया. जहाज ने तेजी से रन वे पर दौड़ते हुए जमीन को छोड़ दिया था. जैसे जैसे जहाज ऊपर उठ रहा था वैसे ही खिड़की से दिल्ली की सीमायें नजर आ रही थी. नीचे कई सारी बत्तियां जल रही थी जैसे जुगनू एक झुन्दा बनाकर एक साथ बैठे हो या फिर किसी युद्ध के बाद मरे हुए लोगों को जलने की चिता जल रही हो. कई जगह पर काले धब्बे नजर आ रहे थे वो संभवतः वो जगहें थी जहाँ पर बिजली नही थी. झुग्गी झोपडी मे तो आज भी दिया ही जलता है चाहे वो दिल्ली हो या कोई और जगह. तब तक जहाज अपनी पुरानी स्तिथि मे आ चुका था और सामान्य अवस्था मे उड़ रहा था. सबने अपनी अपनी सीट बेल्ट खोल ली थी. अभी मैं इन सब मे उलझा हुआ था की एक अजीब से सिहरन ने मुझे जकड लिया. अचानक मुझे लगा जैसे मेरा कुछ पीछे छूट गया. वास्तव मे क्या था ये मुझे आज तक समझ नही आया और वक्त के साथ साथ वो भाव भी अतीत की घटना बन गया. लेकिन उस समय मुझे कई चित्र दिखाई पड़ने लगे. अपना गाओं, अपना शहर, अपने गाओं के वो साथी जिनके साथ हमने अपना बच्पर गुजरा. ये एक अजीब बात लगाती थी मुझे की गाओं के गंदे तालाब मे नंग धड़ंग खेलते हुए बच्चों मे से एक आज इस जगह तक आ जाएगा और मेरे वो साथी जो गाओं की पाठशाला मे हमेशा मुझसे कहीं ज्यादा अंक लाते थे और वास्तव मे मुझसे ज्यादा प्रतिभा थी उनमे लेकिन पता नही अब कहाँ होंगे वो और क्या कर रहे होंगे. क्या कारन था की मैं यहाँ पर हूँ और वो वहाँ पर हैं. जबकि मुझे उनकी जगह पर होना चाहिए था. शायद इसे ही कहते हैं प्रतिभा कई बार पैसे की मोहताज हो जाती है.
और ऐसा ही कुछ सोचते सोचते मैं सो गया क्यूंकि जब नींद खुली तब हांगकांग पहुचाने वाले थे हम और एयर होस्टेस हमसे सीट बेल्ट बंधने ले लिए कह रही थी. जागकर मैंने उससे कहा की कुछ पीने के लिए मिल सकता है क्या? ऐसा कहते ही उसने एक जूस का गिलास हमे पकड़ा दिया और जहाज के उतरने के कारन वो अपनी जगह पर चली गई. हांगकांग मे तकरीबन एक घंटे रूककर हम वापस जापान के रस्ते पर आ गए. और शाम को लगभग ३ बजे हम ओसाका के कान्साई अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे से बाहर खड़े थे. और तकरीबन ६ बजे हम अपने अपने रूम मे पहुँच गए थे. मैंने भी शाम को कहीं घूमने जाने का प्लान नही बनाया और शाम को ७ बजे ही घर से लाया कुछ खाना खाकर सो गया.
Sunday, June 01, 2008
Subscribe to:
Post Comments (Atom)

0 comments:
Post a Comment