Monday, June 02, 2008

अप्रैल २, २००८
ओसाका, जापान
कल की बात को ही ले ले जिसके बारे मैं अब तक सोचता रहा. कल अपने हॉस्टल मे प्रवेश करने के लिए हमे कई सारे आवेदन भरने पड़े. अजीब बात ये लग सकती है की जापानियों ने जिस तरह से उस स्तिथि मे काम किया था वह वाकई प्रशंसनीय था. हम कल शाम को ६ बजे अपने हॉस्टल मे पहुंचे थे और यहाँ पर काम के घंटे सिर्फ़ ५ बजे तक ही होते हैं. हॉस्टल का वो हॉस्टल इंचार्ज था लेकिन सिर्फ़ हमारे लिए वो अब तक यहाँ रुका हुआ था उसे पता था की इंडिया से तीन लोग यहाँ आ रहे हैं. अन्तर सिर्फ़ इतना है इस काम मे और मेरे देश के काम मे की मैं मेरे देश मे ऐसा कुछ कर रहा होता तो मुझे निश्चय ही कल रात को कहीं बाहर ही सोना पड़ता. मेरे रूम मे सिर्फ़ मैं अकेला रहता हूँ. अंतर्राष्ट्रीय विद्यार्थी हॉस्टल नम्बर १ के चौथे मेल मे कमरा नम्बर १४०८. यही मेरा पता है जापान मे ओसका यूनिवर्सिटी का. अपने रूम का दरवाज़ा खोलते ही सामने एक खिड़की लगी हुई है जिससे बाहर देखने पर लगभग पूरा ओसाका दिखाई पड़ता है क्यूंकि ओसाका यूनिवर्सिटी का ये कैम्पस जिसे मिनोह काम्पुस भी कहते हैं ये शहर के एकदम कोने मे बसा हुआ है. कैम्पस के एक तरफ़ बड़े बड़े पहाड़ हैं और दूसरी तरफ़ पूरा ओसाका शहर है. इन पहाडों के दूसरी तरफ़ क्योतो शहर बसा हुआ है जिसका ऐतिहासिक महत्व है. खिड़की से लगी हुई है एक अलमारी जिसमे कई सारी दराजें बनी हुई है. खिड़की से लगी दोनों दीवारों पर एक मोटा सा वाल पेपर लगा हुआ है और फर्श पूरी तरह से सिंथेटिक प्लास्टिक से बना हुआ है. शायद ये एहतियात यहाँ पर अक्सर आने वाले भूकंप के कारन रखा गया है जिससे पूरी इमारत के वजन को कम किया जा सके. एक तरफ़ की दीवार से लगी हुई एक अलमारी है जिसका आकार बहुत छोटा है लेकिन उसमे सिर्फ़ कई सारी दराजें बनी हुई है. खिड़की के सामने वाली दीवाल से लागु हुई एक और बड़ी अलमारी है जिसमे मेरे कपड़े पड़े हुए हैं और खिड़की के पास ही एक मेज और कुर्सी मिली हुई है जो मेरे ख्याल से पढ़ाई करने के लिए है और जिसे देखकर मैं मुस्कुराने लगा."इन्होने ये शायद पहले से सोच रखा है की मैं यहाँ आकर पढ़ाई करने वाला हूँ, ये बात सही है की ये स्कोलरशिप हमे पढ़ने के लिए ही मिली है लेकिन फिर भी ये किसी के बारे मे इतना निश्चित होकर कैसे कह सकते हैं की मैं पढ़ाई ही करूँगा." मैंने सोचा. लेकिन अगले ही पल मुझे अपने इस बकवास विचार पर खीझ आने लगी. हमेशा विनाश की तरफ़ क्यों सोचने लगता हूँ. इसके अलावा एक बढ़िया सा बिस्तर भी दिया हुआ है, जिस पर कल रात इतना थका हुआ होने के बावजूद भी मैं सो नही सका. यही एक चीज़ है जिसके बारे मे मुझे डर था और जो शायद सही होने लगा था की यहाँ नींद कैसे आयेगी. अनजान देश मे कैसे चैन की बंशी बजा सकता था मैं हालांकि यहाँ कोई खतरा नही था लेकिन अपने देश मे तो किसी भी अनजान जगह मे भी नींद आ जाती है.आज का सारा दिन तो रूम मे पड़े पड़े ही गुजर गया. क्लास्सेस इस हफ्ते के बाद शुरू होंगी इसलिए मेरे पास ये पूरा हफ्ता पड़ा हुआ है इस शहर मे घूमने के लिए लेकिन सिर्फ़ पैदल घूमना ही एक साधन है यहाँ पर क्यूंकि बस या ट्रेन मे सफर करना यहाँ बहुत ज्यादा महंगा है. इंडियन रूपए से तुलना करूँ तो यहाँ पर कहीं भी जाने के कम से कम ८० रूपए लगते हैं. कम से कम किराया इतना ही है. इसलिए कल से ओसाका के पैदल ही चक्कर लगाऊंगा. मेरे साथ मे जो लोग इंडिया से आये है वो भी अपने अपने हॉस्टल मे चले गए हैं और अभी तक शायद सो रहे है क्यूंकि अभी यहाँ पर सुबह का ५ बजा हुआ है लग रहा है जैसे पूरी दोपहर होने को आ गई है. पता नही यहाँ सूरज इतना जल्दी कैसे आ जाता है.

1 comments:

सहर् said...

great going..
you are writing really well..
upload some photos too on the blog..
it will enhance the effect..

mrityunjay