नमस्कार
अपनी बात शुरू करने से पहले , मै अपनी बात कहने का मकसद बताना चाहता हूँ . मुझे बचपन से ही अर्थशास्त्र मतलब इकोनोमिक्स पढ़ने का समझने का बहुत शौक था . लेकिन , समस्या ये थी की मुझे इस अर्थशास्त्र की बातें , अर्थशास्त्रियों के सिद्धांत , अनबुझ पहेली जैसा वो गणित कभी समझ में नहीं आया. और मुझे ऐसा लगता है की ऐसा सिर्फ मेरे साथ ही नहीं होता , आप सब भी इसी तरह की उलझन से गुजर चुके होंगे या गुजर रहे हैं.
भी बड़ी समस्या ये है की अर्थशास्त्रियों की कक्षाओं में जाकर भी कभी उनका पढाया हुआ समझ में नहीं आया . हो सकता है की मेरी बुद्धि का स्तर उतना नहीं हो जितना इन सब बातों को जानने के लिए जरुरी होता है , लेकिन जानने का हक तो हमें हैं और वो हम जान कर ही रहेंगे . अर्थात मेरी बात लिखने का सिर्फ एक उद्देश्य है की मेरी जैसी मोटी बुद्धि वाले लोगों के दिमाग के लिए एकदम आसान तरीके से इस अर्थशास्त्र की गुत्थियों को सुलझाया जाए और उसके लिए सबसे पहले ऐसी भाषा का इस्तेमाल किया जाए और ऐसे शब्द इस्तेमाल किए जाएँ की आसानी से समझ में आ सके . उसका स्तर ऐसा होना चाहिए की गाँव की पाठशाला में पढ़े , किसी ५ वीं फेल लड़के को भी समझ में आ जाए
इस श्रंखला में कई सारे बिन्दुओं पर मै अपनी बात कहूँगा जिनमे कई सारे छोटी बड़ी बातें सब शामिल रहेंगी ......और स्वाभाविक है की उसमे कहीं गलतियाँ हो जाएँ .....इस आपके सहयोग का मै प्रतीक्षारत हूँ यहाँ से मै अपनी बात शुरू करता हूँ .
इस बात का शीर्षक है, अमेरिका में हुआ सबप्राइम संकट
मै ये बात उन्ही ५ वीं फ़ैल लोगों को सामने रख कर लिख रहा हूँ इसलिए शायद देखने या सुनने में ये शीर्षक बहुत कठिन महसूस हो सकता है और ऐसा लग सकता है की इस सबको समझने के लिए बहुत बड़े ज्ञान के भंडार की जरुरत पड़ेगी , वरना हो सकता है की हम जैसे बेवकूफों के समझ में न आये ...बात सच भी हो सकती है लेकिन मुझे इस बात की परवाह नहीं जहाँ भी हम हैं उसी से हम शुरुआत कर सकते हैं ...
इसलिए मै यहाँ पर ये बात स्पष्ट कर देना चाहूँगा की इस बिंदु पर जहाँ से हमने शुरुआत की है उस जगह पर हमें कुछ नहीं आता . बाजार, मार्केट , शेअर , स्टोक्स , मोल भाव , इत्यादि के बारे में कुछ नहीं पता . कहानी इतनी है की हम बस बाजार जा रहे थे और किसी ने पकड़ लिया और हमें ऐसे ही बतिया रहा है . बस इतना ध्यान में रखना है जो चीज़ें हमें बताई जा रही है हम उन्हें अपने ध्यान में रखे और जब तक एक दम पूरी तरह से समझ में न आ जाए तब तक हाँ न करे
मै अपनी बात के केंद्र में जाना चाहूँगा १५ सितम्बर २००८ को अखबार के पहले पन्ने पर बड़े बड़े अक्षरों में एक खबर छपी . मुद्दा था की अमेरिका का एक बहुत बड़ा बैंक, जिसका नाम लीमन ब्रदर्स था, वो दिवालिया हो गया और एक बहुत बड़ा बुलबुला जिसका नाम सबप्राइम बुलबुला था वो फूट गया . हमने जब वो खबर पढ़ी तो हमारी ऑंखें चौंधिया गयी .
इसलिए नहीं की हमें इतनी बड़ी बात पता चल गयी बल्कि इस लिए की अखबार ने जो बड़े बड़े शब्द इस्तेमाल किया उसका मतलब क्या होता है ये वहां नहीं लिखा था . हमने भी पढ़ने के बाद सोचा की भैया बड़े लोग बड़ी बातिएँ . होता होगा ऐसा कोई गुब्बारा किसी ने जाकर फोड़ दिया हमको इससे क्या . अखबार वाले भी जाने क्या क्या छाप देते हैं बताओ ये भी कोई खबर है . लेकिन अगर अब हम लट्ठ मारके पीछे पड़ जाएँ की आखिरकार ऐसा क्या लिखा है इस अखबार में की हमें समझ नहीं आ सकता . तो फिर हमारी बात ध्यान से सुनो .
पहली बात की ये लीमन ब्रदर्स आखिरकार है क्या ? लीमन ब्रदर्स अमेरिका की उन कई बड़ी कंपनियों में से एक है जो शेअर्स और स्टोक्स का व्यापर करती है .
सवाल ये है की भैया , ये शेअर और स्टोक्स क्या होता है...तो आसान से शब्दों में कहे तो ......मान लो की अगर हमारे पप्पू को एक चाय की दुकान खोलनी है तो ये तो सब जानते है की उसे पैसे की जरुरत पड़ेगी ,उसके पास २००० रूपए पहले से हैं लेकिन उसे दुकान चलाने के लिए कम से कम ३००० रूपर चाहिए .....मान लो की अगर ऐसा हो तो ....... तो क्या करेगा ... वो जाकर के महाजन के पास जाएगा , बैंक के पास जाएगा , और कर्जा लेने के लिए अर्जी देगा , और कुछ चीज़ गिरवी रखने पर उस गिरवी रखी चीज़ के दाम के बराबर उसे पैसा मिल जाएगा और साल भर में कुछ पैसा उसे ब्याज के रूप में भी देना पड़ेगा .....और उतने समय के अंतराल के बाद अगर उसने ब्याज मिलाके पूरा पैसा महाजन या बैंक को नहीं दिया तो बैंक या महाजन उसकी वो गिरवी रखी चीज़ जब्त कर लेगा और उसे बेचकर अपना पैसा वसूल करेगा . और इस काम में आप कानूनी लडाई भी नहीं कर सकते क्यूंकि सब लिखा पढ़ी की जाती है .... .
ये तो सामान्य सी बात है, लेकिन बस ये देखने में ही सामान्य सी है पूरी दुनिया भर की तमाम बातिएँ और दुनियादारी इसी से जुडी हुई है इसलिए आगे के लिए इस बात को एकदम कसकर बंधकर समझ लो. तो बात थी की की शेअर्स क्या होते हैं .....
अब इसी कहानी को थोडा बड़े स्तर पर ले जाकर सोचते हैं ...अब यही पप्पू बैंक या महाजन के पास न जाकर कुछ अमीर लोग जिनके पास ठीक ठाक पैसा है और जो उधार देने की ताकत रखते हैं उनके पास जाता है , और उनसे पैसा मांगता है और वो लोग उसे पैसा दे देते हैं.. तो आप अब ये सोचेंगे की भैया ये तो पुराणी बात है इसमें क्या अंतर है चाहे लोगों से लो या महाजन से
तो बात ये है की यहाँ पर बैंक या महाजन के पैसे से अंतर सिर्फ इतना है की पप्पू ने इस बार कोई चीज़ गिरवी नहीं रखी , बस एक कागज , मतलब की कानूनी कागज ,पर ये लिख कर दे दिया की फलाने भाईसाहब ने हमें मान लो १००० रूपया दिया है जो मेरी दुकान की कुल कीमत का एक तिहाई मतलब ३३% है और इसके बदले में वो और उनका पूरा परिवार मेरे यहाँ आकर मुफ्त में चाय पी सकता है..और मेरी दुकान से होने वाली आमदनी से ३३% हिस्सा उनका होगा ...मतलब इस दुकान के एक तिहाई मालिक ये भी हैं और सारे निर्णय में ये तिहाई हक़दार हैं ...जितना ज्यादा मुनाफा होगा उतना ही ज्यादा हिस्सा
बात आसान है की नहीं ........बस एक कानूनी कागज दो और पैसा लो ......और कुछ गिरवी रखने का भी झंझट नहीं और हमारे पप्पू ने इस शर्त पर पैसे लेकर धंधा शुरू कर लिया ..........................अब इस कहानी में कुछ शब्द और डालते हैं .....जो पैसा पप्पू को मिला उसे अर्थशास्त्र की भाषा में कैपिटल या फंड कहते हैं ...और जहाँ तक थी बात शेअर्स की तो एकदम आसान शब्दों में कहा जाए तो .जो कानूनी कागज उसने साइन कर के दिया उसे ही हम कहते हैं .....शेअर्स या स्टोक्स
बड़े बड़े शहरों में , अमेरिका में , लन्दन में सब जगह इसी सिद्धांत पर पैसा लिया और दिया जाता है ......अभी तो माना की पप्पू को जाना पड़ा पैसा मँगाने ........धंधा चल निकले तो कल को उसे पैसे देने लोग आयेंगे उसके पास....की ले भाई पप्पू तेरी दुकान बहुत चलती है और ग्राहक भी बहुत आते हैं ...तो तू एक आदमी और रख ले और एक नया चूल्हा और ले ले और दुगना धंधा करने लग जा ... और उसने पप्पू को १००० रूपए दिए और वैसा ही एक कागज उसने भी साइन करवा लिया .....अब अगर इस जगह पर पप्पू एकदम मेहनती आदमी है .....और अपने धंदे को और बढ़ाना चाहता है .....और २० लोग को काम पर रखके पूरे सेहर ऐसा अपनी दुकान खोलना चाहता है तो वो ऐसे ही और सारे कानूनी कागज मतलब शेअर्स बनवा लेगा और उसे बाँट कर लोगों से पैसा जमा करेगा ..........
अब अच्छा एक बात.....मान लो ..अब तक उसने चार शेअर्स बनवाए..१००० १००० रूपए के और उसी के अनुसार प्रोफिट हिस्सेदारी के.....तो कुल मिलाके तस्वीर क्या बनेगी.........उसके पास थे २००० रूपए ......बाकि जमा किया उसने और ४००० हजार ...तो उसके इस तरह के कुल बिजनेस की कुल कीमत हुई ६००० रूपए...............लेकिन अब अगर वो चारों एक साथ मिल जाएँ .......तो पप्पू की दुकान में हिस्सेदारी बचेगी २००० रूपए मतलब १ तिहाई और वो चार जो अब एक हो गए हैं उन की कुल हिस्सेदारी हो जाएगी ४००० रूपए मतलब दो तिहाई .......और अगर ऐसा हुआ तो भैया अब वो दुकान पप्पू की नहीं रही .....अब उसे वो चारों चलाएंगे ...ऐसा नहीं है की पप्पू को लात मारके भगा दिया जाएगा वो रहेगा वहीँ पर .......बस ये है की वो अब बस दुकान के एक तिहाई मतलब ३३% शेअर्स का मालिक बनके रह जाएगा और जिसके कारन उसे दुकान के प्रोफिट में ३३% हिस्सा मिलता रहेगा ......इसलिए शेअर्स बेचते समय मालिक को हमेशा अपने पास कुल पूँजी के ५१% शेअर्स जरुर रखने पड़ते हैं वरना वो बिसनेस उसका नहीं रहता .......
तो कहानी कुछ ऐसी बनती है ....की कोई भी कंपनी या दुकान ,जब पैसे की कमी से गुजराती है ,तो वो अपनी कंपनी के कुछ शेअर्स बेच देती है जिसे हम पब्लिक इश्यू भी कहते हैं ..और जहाँ पर इन सब शेअर्स का व्यापार होता है उसे ही शेअर बाजार कहते हैं ..मतलब वो अपने कंपनी या दुकान का कुछ हिस्सा मतलब की कुछ % बेचने के लिए ...उसे कई टुकड़े करके .ऐसे कानूनी कागज बनवा के लोगों को बेचके और उनसे फंड जमा करती है ....और कई कई कम्पनियाँ तो ऐसी होती है जिनके कुल शेअर्स की संख्या करोडों में होती है और एक एक शेअर का दाम हजारों रूपए होता है मतलब की उस कमपनी की कुल पूँजी अरबों में होती है ...उसका १% हिस्सा खरीदने के लिए कई बार उसके लाखों शेअर्स भी खरीदने पड़ जातें हैं लेकिन उन सबका सिद्धांत यही है ....
जब कोई कंपनी बहुत अच्छा कम रही होती है तो उसके शेअर्स खरीदने के लिए ज्यादा पैसे देने होते हैं ..अब जरा आसान शब्दों में कहे तो ..मतलब की आज आपके पास किसी १००० रूपए की दुकान में १% की हिस्सेदारी है जिसे खरीदने के लिए आपने उसके १० शेअर्स खरीद लिए .....उस दुकान ने दिन दुगनी रात चौगुनी तरक्की कर ली और १००० रूपए का प्रोफिट कमाया ..लेकिन अब भी उसमे आपकी हिस्सेदारी १% की ही रहेगी बस आपके शेअर्स के दाम दोगुने हो जाएँगे ........क्यूंकि आप की दुकान की कुल कीमत आज कल की कीमत से दोगुनी हो गयी है और उसका १% आज दोगुनी कीमत रखता है ......
ये तो थी शेअर्स , शेअर मार्केट , फंड , प्रोफिट , लॉस , पब्लिक इश्यू की बात ........
अगर इन सारी बातों का कुछ हिस्सा भी आप समझ लेंगे तो अखबार की कई सारे खबरें जो कल तक आपके पल्ले नहीं पड़ती थी ......हो सकता है वो पूरी १००% अभी भी न समझ में आयें लेकिन कुछ बहुत तो समझ में आ ही जाएगी
जैसे हम सब अखबार इतनी रोज पढ़ते है की टाटा बिरला और अम्बान ने आज फलाने कंपनी को खरीद लिया जिसे इकोनोमी की भाषा में टेक ओवर भी कहते हैं .......तो जब बड़ी कंपनी किसी कंपनी को टेक ओवर करती है तो इसका सीधा सा एक ही मतलब होता है की उसने उस कंपनी के ५१ % या उससे ज्यादा शेअर्स खरीद लिए.......और उस पर मालिकाना हक उसका हो जाता है .....
इस बार के अंक के लिए सिर्फ. यहीं तक आगे की बात अगले अंक में .................
तो भैया इस जगह पर अगर शेअर्स, फंड, कैपिटल, टेक ओवर , इन चार शब्दों का लमसम मतलब समझ आ गया हो तो हमें लगेगा की हमने जो कहा उसको कहने का तरीका ठीक था ...मै ये नहीं कहता की इससे और सरल तरीके से समझाया नहीं जा सकता , जरुर समझाया जा सकता है ...लेकिन , मैंने यहाँ पर वही तरीका इस्तेमाल किया है जिस तरीक से, और जितनी भी दूरी तक मैंने ये सारी बातें खुद समझी है.....
इस संबध में आपके प्रश्न , सुझाव, त्रुटी , स्पष्टीकरण सबका तहे दिल से स्वागत है ..... शुक्रिया

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