Wednesday, June 03, 2009
मेरा मत : जापान के बारे में
ये पोस्ट मै सिर्फ अपने विचारों को प्रकट करने के लिए लिख रहा हूँ ... जापान आने से पहले जापान के बारे में जो भी परिकल्पना करी थी मैंने ...जापान उन सबमे बेहतर साबित हुआ है ...मै मानता हूँ की जापान ने जैसी प्रगति की है वैसी प्रगति किसी भी देश के लिए तकरीबन नामुमकिन जैसी है ...अपने गिने चुने संसाधनों का जैसा सर्वोत्तम प्रयोग जापान ने किया है वैसा किसी भी देश में दुर्लभ है ......जापान में रहते हुए अपने काम में रमे हुए जापानी लोगों को देखकर मुझे अक्सर भारतीय साहित्य के प्रणेता भारतेंदु हरिश्चंद्र जी का एक निबंध की कुछ पंकियाँ याद आती है....जिनमे उन्होंने कहा था ...."ये समय विश्व प्रतिश्पर्धा का दौर है ...सब भाग रहे हैं...विकास की ओर ..उन्नति की ओर ...अमेरिका भाग रहा है .....विश्व युद्ध में परस्त जर्मनी भाग रहा है .....और जापान ....जापानी टट्टू भी हांफते हुए भाग रहे हैं ...लेकिन हम भारतीय जापानी टट्टुओं को हांफते हुए दौड़ते हुए देखभर भी शर्म नहीं खाते...." ये बात बहुत ही आसान सी जान पड़ती है .....लेकिन इसका अर्थ बहुत ही गहरा है .....न्यूनतम प्राकृतिक संसाधनों के बावजूद उन्नति के लिए जो जोश जापान में है वो कहीं नहीं है....हम भारतीय आज भी धर्म, जाति, संप्रदाय के पीछे पागल हुए जाते हैं...धर्म के नाम पर हम पर जुल्म होते हैं तब भी हम सब सहन कर जाते हैं.....जाति के नाम पर हम पर जुल्म होते हैं हम सब सहन कर जाते हैं........मेरे विचार से तो इन सब मूल्यों और परम्पराओं का कोई अर्थ नहीं है....ये हमारे साथ न भी होती तो भी हम इसी जगह पर होते जहाँ हम आज हैं.....या ये कहें की हम किसी बेहतर जगह पर होते अगर इन सब जंजीरों ने हमें जकडा न होता ....... अब तो सिर्फ एक ही बात दिमाग में है ...........जापानी टट्टू कल भी भाग रहे थे .......और आज भी भाग रहे हैं.......... और हम भारतीय कल भी बंधे हुए थे ..........और आज भी बंधे हुए हैं............मै अपनी तरफ से पूरी कोशिश करूँगा की ये बंधन तोडा जा सके .........हम भी भाग सकें..........हांफते हुए ही सही............कम से कम भाग तो सके.........विश्व प्रतिस्पर्धा के इस दौर में ....................
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1 comments:
totally agree with you :)
And that day is not very far my dear.
good work.
keep writing :)
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